डिप्रेशन केवल उदासी नहीं है। जब उदासी, खालीपन और किसी काम में मन न लगना दो सप्ताह से अधिक लगातार बना रहे और रोज़मर्रा के काम, नींद, भूख तथा रिश्तों पर असर डालने लगे, तब यह एक चिकित्सकीय रोग बन जाता है। यह मस्तिष्क के रासायनिक संतुलन से जुड़ा है — इसमें व्यक्ति का कोई दोष नहीं होता, और उचित इलाज से अधिकांश मरीज़ पूरी तरह स्वस्थ जीवन जीते हैं।
मुख्य लक्षण
- अधिकांश समय उदासी, खालीपन या रोने का मन
- जिन कामों में पहले आनंद आता था, उनमें रुचि न रहना
- लगातार थकान, ऊर्जा की कमी, शरीर भारी लगना
- नींद बहुत कम या बहुत अधिक हो जाना
- भूख और वज़न में स्पष्ट परिवर्तन
- ध्यान केंद्रित न कर पाना, निर्णय लेने में कठिनाई
- स्वयं को बेकार, दोषी या बोझ समझना
सामान्य कारण
- मस्तिष्क के रसायनों (सेरोटोनिन आदि) में असंतुलन
- परिवार में किसी को यह रोग रहा हो
- किसी अपने की मृत्यु, तलाक, नौकरी या व्यापार की हानि
- लंबे समय तक चलने वाला तनाव या अकेलापन
- थायरॉइड, विटामिन B12 की कमी जैसे शारीरिक रोग
- शराब या अन्य नशे का सेवन
उपचार
इलाज मुख्यतः दो हिस्सों में होता है — दवा और थेरेपी। एंटीडिप्रेसेंट दवाएँ मस्तिष्क के रासायनिक संतुलन को ठीक करती हैं; इनका पूरा असर आने में सामान्यतः 3 से 6 सप्ताह लगते हैं, इसलिए धैर्य आवश्यक है। साथ में काउंसलिंग तथा CBT (कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी) सोचने के नकारात्मक ढर्रे को बदलने में सहायता करती है। नियमित दिनचर्या, प्रतिदिन थोड़ा व्यायाम, धूप और पर्याप्त नींद इलाज की गति बढ़ाते हैं। लक्षण ठीक हो जाने के बाद भी दवा कुछ महीने चलाई जाती है, ताकि रोग दोबारा न लौटे।
भ्रम: “यह तो मन की कमज़ोरी है, थोड़ा मज़बूत बनो तो ठीक हो जाएगा।”
सच: यह मस्तिष्क का रोग है, ठीक वैसे ही जैसे मधुमेह शरीर का। कहने भर से न मधुमेह ठीक होता है, न डिप्रेशन।
भ्रम: “एक बार दवा शुरू कर दी तो जीवन भर खानी पड़ेगी।”
सच: अधिकांश मरीज़ों में दवा सीमित अवधि के लिए चलती है और चिकित्सक की देखरेख में धीरे-धीरे बंद कर दी जाती है।